Uncategorized

*सामयिक मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम ,अनुपम एवं विशिष्ट साधन है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया*…. *हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव रखना चाहिए — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत* *समय का सदुपयोग करें– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया*

सामयिक मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम ,अनुपम एवं विशिष्ट साधन है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया

हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव रखना चाहिए — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत
समय का सदुपयोग करें– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया

रिपोर्ट:यश पांडे

 

खिरकिया — श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के अंतर्गत समता प्रचार संघ के माध्यम से पधारे वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया रतलाम ने पर्यूषण पर्व के सातवें दिवस के अवसर पर समता भवन में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि– वीतरागता प्राप्त करने के लिए जीवन में समभाव आना जरूरी है। समभाव से ही मोक्ष रूपी महल का निर्माण होता है। जिस प्रवृत्ति से हमें समता की , समभाव की प्राप्ति होती है वह सामायिक है ।शुद्ध आत्मा का स्वभाव समभाव ही है। अतः आत्मा को शुद्ध बनाने की प्रवृत्ति सामायिक है ।सामायिक दो प्रकार से की जाती है द्रव्य से और भाव से। समस्त जीवों पर समभाव रखना, पांचो इंद्रियों पर संयम रखना, शुभ भावना रखना सामायिक है। उन्होंने आगे कहा कि – सामायिक के द्वारा घाती कर्मों का क्षय करके केवल ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वास्तव में सामायिक मोक्ष प्राप्ति का एक सर्वोत्तम ,अनुपम एवं विशिष्ट साधन है।

इसके पूर्व स्वाध्यायी ऋषभ मुणत रतलाम ने धर्म रूचि अनगार के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- हमें विषम परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होना चाहिए। हमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव रखना चाहिए। हमें जीवों के प्रति मैत्री भाव रखना चाहिए। उनके प्रति करुणा और दया का भाव रखना चाहिए। जिस व्यक्ति में दया ,करुणा के भाव रहते हैं उसका इहलोक और परलोक दोनों सुनहरे बनते हैं।

मुंबई से पधारे स्वाध्यायी धीरज चौरडिया ने कहा कि – समय अनमोल है। समय का सदुपयोग धर्म आराधना ,साधना करके करें। यदि हम समय की कद्र करेंगे तो समय हमारी कद्र करेगा। जीवन की तीन स्टेप होती है बचपन ,जवानी और बुढ़ापा बचपन में समय तो होता है पर समझ और शक्ति नहीं होती।जवानी में समझ और शक्ति तो होती है पर समय नहीं रहता और बुढ़ापे में समय और समझ तो रहती है पर शक्ति नहीं रहती इसलिए समय रहते हम धर्म आराधना ,साधना कर लें। उन्होंने आगे कहा कि – मुखपत्ती जैन की पहचान है इसलिए इसे हमेशा साथ रखें। मुखपत्ती धारण करने से वायुकाय के जीवों की रक्षा होती है। हम धर्म पर अडिग रहे ।हम दृढ़धर्मी ,प्रियधर्मी बने।इस अवसर पर सैकड़ों श्रावक – श्राविकाएं और श्रद्धाशील गुरु भक्त उपस्थित थे ।
स्वाध्यायी बंधुओं के मुखारबिंद से रत्ना आशीष समदड़िया ने 7 उपवास के प्रत्यखान लेकर दृढ़ मनोबल का परिचय दिया एवं प्रमिला भंडारी,नरेंद्र विनायक,भारती विनायक ने 2 उपवास के पचखान ग्रहण किए कई श्रद्धाशील उपासकों ने त्याग
प्रत्यख्यान ग्रहण किए।भी
प्रभावना का लाभ स्व.कांता बाई नगीनचंद भंडारी ने लिया।
धर्म सभा का संचालनआशीष समदड़िया ने किया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!