*जैन धर्म जन-जन का धर्म है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया*… *जल है ,तो कल है स्वाध्यायी ऋषभ मुणत*….. *धर्म कभी भी धोखा नहीं दे सकता, धन धोखा दे सकता है– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया*

जैन धर्म जन-जन का धर्म है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया
जल है ,तो कल है — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत
धर्म कभी भी धोखा नहीं दे सकता, धन धोखा दे सकता है– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया
रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया — श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के अंतर्गत समता प्रचार संघ के माध्यम से पधारे वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया रतलाम ने पर्यूषण पर्व के छठवें दिवस के अवसर पर समता भवन में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि– जैन धर्म जन – जन का धर्म है यह धर्म किसी व्यक्ति विशेष ,जाति, वर्ग का नहीं है इस धर्म का जो आचरण करेगा, यह धर्म उसी का है ।जैन धर्म प्राणी मात्र के लिए है और जिनवाणी मोतीचूर के लड्डू के समान मीठी ,रसदार है। जो निर्ग्रन्थ मुनि जिन आज्ञा में विचरते हैं उनकी निष्काम, निस्वार्थ भाव से सेवा करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। निर्ग्रन्थ मुनि भिक्षा शाकाहारी घर से ही करते हैं। निर्ग्रन्थ मुनि की त्याग वृत्ति देखकर ही व्यक्ति उनसे प्रभावित होता है। उन्होंने माँ की ममता का विस्तार पूर्वक वर्णन करते हुए कहा कि- माँ प्रथम गुरु है। माँ ही दया की खान है। माँ के ही कारण यह संसार ,परिवार है। माँ की महिमा का गुणगान भगवान भी करते हैं ।जीवन को सुसंस्कारित बनाने के लिए माता-पिता की अग्लान भाव से सेवा करें ।माता-पिता और गुरु का ऋण कभी भी उतारा नहीं जा सकता।
इसके पूर्व स्वाध्यायी ऋषभ मुणत रतलाम ने बच्चों को छोटी-छोटी टिप्स देकर,जैन धर्म की मूलभूत बेसिक जानकारी देकर धर्म से जोड़ने का सराहनीय कार्य किया।उन्होंने जैन धर्म से संबंधित छोटे-छोटे प्रश्न बच्चों से पूछे जिनका उत्तर बच्चों ने बड़े ही सटीक ढंग से दिया।जल संरक्षण एवं संवर्धन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्होंने सभी से आव्हान किया कि जल का संरक्षण और संवर्धन करें।जल ही जीवन है। जल है तो कल है।
मुंबई से पधारे स्वाध्यायी धीरज चौरडिया ने कहा कि – हमारी सोच हमेशा पॉजिटिव होने चाहिए।पॉजिटिव सोच से ही सफलता प्राप्त होती है। व्यक्ति कभी भी असफल नहीं होता बल्कि वह उसे सीखता है और सफल होता है।उन्होंने आगे कहा कि- धर्म को जीवन में स्थान दें।धर्म कभी भी धोखा नहीं दे सकता,धन धोखा दे सकता है।देव गुरु धर्म पर गृहरी श्रद्धा रखें।उन्होंने सभी से आह्वान किया कि जीवन में किसी एक साधु -साध्वियों को बेस्ट फ्रेंड्स की तरह बनाएं ताकि हम अपनी महत्वपूर्ण बातों को उनसे शेयर कर सकें। इस अवसर पर सैकड़ों श्रावक – श्राविकाएं एवं श्रद्धाशील सधर्मी गुरुभक्त उपासको के साथ-साथ दूरस्थ एवं समीपस्थ अंचल कालधड़ से दुर्गा प्रसाद मुछाला,भागवत मुछाला,नारायण छलोत्रे, जागेश्वर साकले, नटवर सिसोदिया,योगेश मुकाती,आयुष मुकाती, छिपावाड़ से गंगाविशन जरखड़िया मुनीम जी ,विजय खरबड़िया, पाहनपाठ से शिवनारायण साध, सांगवा से बद्रीप्रसाद पटेल, जटपुरा से महेश राजपूत जुगल किशोर मालवी, लक्ष्मी नारायण शर्मा आदि उपस्थित थे। जागेश्वर साकले ने गुरु भक्ति से ओत-प्रोत भजन सुना कर तथा शिवनारायण साद,विजय खराबडिया, दुर्गाप्रसाद मुछाला, नटवर सिसोदिया ने प्रवचन पश्चात अभिव्यक्ति देकर सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया।
स्वाध्यायी बंधुओं के मुखारबिंद से रत्ना आशीष समदड़िया ने 6 उपवास के प्रत्यखान लेकर दृढ़ मनोबल का परिचय दिया।कई श्रद्धाशील उपासकों ने त्याग
प्रत्यख्यान ग्रहण किए।प्रभावना का लाभ धर्मेंद्र नगीनचंद भंडारी ने लिया।
धर्म सभा का संचालन करते हुए आशीष समदड़िया ने पधारे सभी सभी श्रद्धाशील गुरु भक्तों की श्रद्धा – भक्ति समर्पणा की सराहना करते हुए उनके सेवा भाव के गुणों को सभी के समक्ष रखा। सभी से आग्रह किया कि समय समय पर जिनवाणी का लाभ लेते रहे और अपने भाग्य को जगाए।




