*दुख का कारण राग -द्वेष है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया*.. *सेवा निस्वार्थ निष्काम भाव से करें — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत*…. *राग – द्वेष की गांठों को क्षमा से दूर किया जा सकता है– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया*

दुख का कारण राग -द्वेष है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया
सेवा निस्वार्थ निष्काम भाव से करें — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत
राग – द्वेष की गांठों को क्षमा से दूर किया जा सकता है– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया
रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया — समता प्रचार संघ के माध्यम से पधारे वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया रतलाम ने पर्यूषण पर्व के प्रथम दिवस पर समता भवन में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि – यह संसार राग – द्वेष के कारण दुखी है। राग -द्वेष जब तक रहेगा तब तक हम सुखी नहीं बन सकते। वास्तविक सुख तो मोक्ष प्राप्त करने में है परंतु व्यक्ति सुख की खोज भौतिक सुख-सुविधाओं में कर रहा है। सुख तो अपनी आत्मा में ही है। दुख के मुख्य कारण राग -द्वेष को तप- संयम ,धर्म आराधना, साधना करके दूर किया जा सकता है ।उन्होंने आगे कहा कि- जिस व्यक्ति में विनय, दया और अनुकंपा होती है वही व्यक्ति सही मायने में ज्ञानी है ।उन्होंने कहा कि जीवन में तीन चीजों का आचरण करना चाहिए पहला – हृदय में राम, राम अर्थात सत्य दूसरा – मन में दया और तीसरा- तन में सेवा। इसके पूर्व स्वाध्यायी ऋषभ मुणत रतलाम ने कहा कि – सेवा भाव से अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। जिसके अंदर अहंकार होता है वह सेवाभावी नहीं हो सकता ।सेवा भाव धार्मिक व्यक्ति की निशानी है। सेवा करने वालों की सदा जय जयकार होती है। सेवा करने से कर्मों की विपुल निर्जला होती है। सेवा निस्वार्थ निष्काम भाव से करें। जीवन में सेवा भाव को स्थान दें। सेवा अनेकों प्रकार से की जा सकती है सेवा करने से देव- आयुष्य का बंध भी हो सकता है। मुंबई से पधारे स्वाध्यायी धीरज चौरडिया ने कहा कि – हमारा देश पर्वों का देश है। हमारे देश में विभिन्न पर्व मनाये जाते हैं। पर्व अर्थात त्यौहार पर्यूषण पर्व के अवसर पर हम राग -द्वेष की गांठों को दूर करें। राग- द्वेष को दूर करने के लिए क्षमा ही उत्तम है। इस अवसर पर सैकड़ों श्रावक – श्राविकाए एवं श्रद्धा शील उपासक धर्म सभा में उपस्थित रहे।कई ने त्याग प्रत्याखान ग्रहण किए गए। प्रभावना का वितरण किया गया।धर्म सभा का संचालन आशीष समदड़िया ने किया।




