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*150 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम, छीपाबड़ में नागपंचमी से सातुड़ी तीज तक झूलते हैं श्रीराम*….. *राजस्थान से आया 150 साल पुराना पालना, पीढ़ियों से निभ रही श्रीराम को झुलाने की अनूठी परंपरा*…… *छीपाबड़ की अनमोल विरासत: 150 साल पुराने पालने में झूलते हैं भगवान श्रीराम*……. *भजनों के बीच सजता है डेढ़ सदी पुराना पालना, छीपाबड़ में आज भी जीवंत है श्रीराम की अनूठी परंपरा*….. 5.

150 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवंत: छीपाबड़ के राम मंदिर में नागपंचमी से सातुड़ी तीज तक झूलते हैं श्रीराम

राजस्थान से आया विशाल पुरातन पालना बना आस्था और विरासत का प्रतीक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिवदत्त दधीच भी भजनों के बीच सजाते थे पालना

खिरकिया/छीपाबड़। भगवान को पालना झुलाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच प्रेम, सेवा और समर्पण का भाव माना जाता है। छीपाबड़ के गांधी चौक स्थित करीब 150 वर्ष पुराने श्रीराम मंदिर में आज भी यह अनूठी परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। नागपंचमी की तीज से सातुड़ी तीज तक भगवान श्रीराम को विशाल पारंपरिक पालने में विराजमान कर झुलाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

राजस्थानी शैली का यह विशाल पालना अपने आप में पुरातन कला और धार्मिक विरासत का अनूठा उदाहरण है। इसे प्रतिवर्ष सजाना, मंदिर में स्थापित करना और बाद में सुरक्षित तरीके से खोलकर रखना आसान नहीं है। इसके बावजूद श्रद्धालु परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।

भजनों के बीच पालना सजाते थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

श्रीराम मंदिर से जुड़ी इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवदत्त दधीच से भी जुड़ा है। उनकी धर्मपत्नी संसारवती देवी बताती हैं कि शिवदत्त दधीच हर वर्ष रामजी का पालना सजाते समय भजन करते जाते थे। वे संस्कृत के विद्यार्थी होने के साथ ज्योतिष के प्रकांड विद्वान और वैद्य भी थे।

संसारवती देवी के अनुसार, शिवदत्त दधीच ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और वर्धा, झांसी तथा सागर की जेलों में भी रहे। उन्होंने सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का त्याग कर अपना अंतिम समय भगवान श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया।

वे बताती हैं कि पहले पालना सजाने में करीब एक घंटे का समय लगता था, जबकि अब इसे तैयार करने में लगभग दो घंटे लगते हैं। परिवार की नारायणी देवी ने भी अपने पिता को भगवान श्रीराम के लिए इस पालने को सजाते हुए देखा था। वर्ष 1991 में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

मंदिर की 92 वर्षीय पुजारन माताराम देवी संसारवती बाई बताती हैं कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना है कि यह विशाल पालना राजस्थान के बीकानेर से मंगवाया गया था। करीब 15 दिनों तक नागपंचमी से सातुड़ी तीज तक पालना बांधने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। अब उम्र अधिक होने के कारण वे स्वयं पालना तैयार नहीं कर पातीं, इसलिए रमेश सोनी और उनकी सुपुत्री रमा देवी इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं।

पटेल परिवार ने कराया था श्रीराम मंदिर का निर्माण

छीपाबड़ के श्रीराम मंदिर के इतिहास की एक और महत्वपूर्ण कड़ी पटेल परिवार से जुड़ी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार विक्रम संवत 1936 में हरिराम पटेल (देशवाली) द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।

मेकलसुता सेवा सदन के संचालक केवलराम मीणा बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने छीपाबड़ में बालाजी मंदिर, नरसिंह मंदिर, श्रीराम मंदिर, भारतीय बाबा मंदिर और सत्यनारायण मंदिर सहित कई धार्मिक स्थलों का निर्माण कराया। इसके अलावा बाजार के कुएं, भारतीय बाबा मंदिर के कुएं और बालाजी मंदिर के कुएं का निर्माण भी कराया गया।

उन्होंने मंदिरों के रखरखाव, पुजारियों की व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं को जारी रखने के लिए जमीन दान की तथा कई पेड़ भी लगवाए। इन कार्यों से संबंधित दस्तावेज आज भी परिवार के पास सुरक्षित होने की बात कही जाती है।

केवलराम मीणा के अनुसार, उनके पूर्वज हरिराम पटेल गोंडवाना राज्य के मालगुजार रहे थे। संतान नहीं होने के कारण उन्होंने अपने छोटे भाई के पुत्र को गोद लेकर वंश परंपरा आगे बढ़ाई। रिकॉर्ड में श्रीराम मंदिर के पुजारी के रूप में रामचंद महाराज दायिमा (दाधीच) की नियुक्ति का उल्लेख भी मिलता है।

राजस्थान से जुड़ती हैं पालने और मंदिर की परंपराएं

शिक्षक महेश तिवारी का मानना है कि इस पूरी परंपरा में राजस्थान से जुड़ी कई कड़ियां दिखाई देती हैं। दोनों परिवारों के राजस्थान से छीपाबड़ आने, पालने के राजस्थान से होने और सातुड़ी तीज की परंपरा राजस्थान से जुड़ी होने को वे महत्वपूर्ण मानते हैं।

उनका कहना है कि सातुड़ी तीज की कथा पुत्र कामना से जुड़ी है, ऐसे में भगवान श्रीराम को पालना झुलाने की परंपरा का संबंध वंश की निरंतरता और संतान की कामना से भी जोड़ा जा सकता है।

नारायणी देवी का वर्ष 1991 में 84 वर्ष की आयु में निधन हुआ था। उनके जन्मकाल से करीब 139 वर्ष पीछे जाने पर यह परंपरा काफी पुरानी दिखाई देती है। वहीं विक्रम संवत 1936 में मंदिर निर्माण का उल्लेख भी इस विरासत की उम्र को लगभग डेढ़ सदी के आसपास ले जाता है। इस तरह मंदिर और पालने की परंपरा की प्राचीनता में एक तरह का तालमेल दिखाई देता है।

महेश तिवारी यह संभावना भी व्यक्त करते हैं कि हरिराम पटेल के मकड़ाई राजघराने से जुड़े होने के कारण मकड़ाई के राम दरबार मंदिर से प्रभावित होकर श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रेरणा मिली हो अथवा तत्कालीन राजपरिवार ने मंदिर निर्माण में सहयोग किया हो। हालांकि यह विषय आगे शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजों की पुष्टि का विषय है।

पुरातन विरासत को सहेजने की जरूरत

छीपाबड़ की यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का हिस्सा है। करीब डेढ़ सदी पुराने मंदिर, राजस्थान से आए पालने और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा इस गांव के समृद्ध इतिहास की कहानी कहते हैं।

विडंबना यह है कि ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित और व्यवस्थित करने की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि छीपाबड़ की पुरातन विरासत को सहेजने के लिए समाज और व्यवस्था दोनों को आगे आना चाहिए।

वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवदत्त दधीच की धर्मपत्नी संसारवती देवी को राष्ट्रीय पर्वों पर भी उचित सम्मान नहीं मिलना चिंता का विषय है। जिस गांधी चौक में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय पर्व मनाए जाते हैं, वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार की इस विरासत को सम्मान और पहचान मिलना क्षेत्र के लिए गौरव की बात हो सकती है।

छीपाबड़ का यह श्रीराम मंदिर और उसका विशाल पालना आज भी यही संदेश देता है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं होता, बल्कि वह हमारी परंपराओं, मंदिरों और उन परिवारों की स्मृतियों में भी जीवित रहता है, जो पीढ़ियों से उसे संभालते आ रहे हैं।

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