*धर्म ही संसार- सागर से तिराने वाला है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया* *हमें कर्म बंध से बचना चाहिए — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत*… *हमें प्रदर्शन में नहीं ,दर्शन में जीना चाहिए– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया*

धर्म ही संसार- सागर से तिराने वाला है — वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया
हमें कर्म बंध से बचना चाहिए — स्वाध्यायी ऋषभ मुणत
हमें प्रदर्शन में नहीं ,दर्शन में जीना चाहिए– स्वाध्यायी धीरज चौरडिया
रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के अंतर्गत समता प्रचार संघ के माध्यम से पधारे वरिष्ठ स्वाध्यायी ललित कटारिया रतलाम ने पर्यूषण पर्व के पांचवें दिवस के अवसर पर समता भवन में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि– यह मानव जीवन हमें बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुआ है।इस जीवन में हम मोक्ष मार्ग की आराधना कर सिद्ध ,बुद्ध और मुक्त हो सकते हैं।महापर्व पर्यूषण एक सुनहरा अवसर है।धर्म ही संसार – सागर से तिराने वाला है।धर्म एक बहुमूल्य कोष है जिसे शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। धर्म की तुलना सांसारिक पदार्थों से नहीं की जा सकती।लेकिन आज व्यक्ति धर्म की अपेक्षा धन को अधिक महत्व दे रहा है। हम धर्म में पुरुषार्थ करें।धर्म यतना, विवेक में है।धर्म के द्वारा ही इहलोक और परलोक को सुधारा जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि – इच्छाएं ,पाप से उत्पन्न होती है और पुण्य से पूरी होती है।जिसके जीवन में धर्म आ जाता है वहां इच्छाएं खत्म या कम हो जाती है।
इसके पूर्व स्वाध्यायी ऋषभ मुणत रतलाम ने कहा कि –स्वप्न 72 प्रकार के होते हैं उसमें 14 महास्वप्न होते हैं।यही महास्वप्न तीर्थंकर और चक्रवर्ती की माता देखती हैं केवल अंतर इतना है कि तीर्थंकर की माता स्पष्ट सपना देखती हैं जबकि चक्रवर्ती की माता धुंधले सपने देखती है उन्होंने आगे कहा कि – हम प्रतिक्षण कर्मों का बंध करते रहते हैं। कर्मों का बंध हम हंसते-हंसते करते हैं और रोते-रोते भोगते हैं। अतः हमें कर्म बंध से बचना चाहिए। कर्म 8 प्रकार के बताए गए हैं ।कर्म का बंध कषाय और योग से होता है।यतना से कर्म बंध को रोका जा सकता है ।
मुंबई से पधारे स्वाध्यायी धीरज चौरडिया ने कहा कि – हमारी आयु निरंतर घटती जा रही है परंतु लोभ और तृष्णा निरंतर बढ़ती जा रही है।लाभ से लोभ उत्पन्न होता है।अतः हमें धन का सदुपयोग करना चाहिए। हमें प्रदर्शन में नहीं ,दर्शन में जीना चाहिए।उन्होंने धर्म सभा में आव्हान किया कि प्रत्येक श्रावक -श्राविका को एक सम्यकत्वी,एक श्रावक और एक साधू बनाना है तभी यह मानव जीवन हमारा सार्थक हो जाएगा। इस अवसर पर सैकड़ों श्रावक – श्राविकाएं एवं श्रद्धा शील उपासक धर्म सभा में उपस्थित रहे। स्वाध्यायी बंधुओं के मुखारबिंद से रत्ना समदड़िया ने 5 उपवास के प्रत्यखान लेकर दृढ़ मनोबल का परिचय दिया।कई श्रद्धाशील उपासकों ने त्याग
प्रत्यख्यान ग्रहण किए।प्रभावना का लाभ शिखर भंडारी एवं सिद्धार्थ विनायक्या ने लिया।
धर्म सभा का संचालन करते हुए आशीष समदड़िया ने सभी से आग्रह किया कि जिनवाणी के लाभ से कोई भी वंचित न रहे,बच्चों को भी संस्कार बनाने हेतु रविवार को अवश्य साथ लेकर आए सोए भाग्य को जगाए।
कल रविवार होने से समता साखा का समय प्रातः 6:15 बजे से, व्याख्यान (जिनवाणी) 8:30 बजे से 10:15 बजे तक रहेगा।




