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*कर्म शरीर से कम और मन से अधिक बनते हैं तत्वज्ञ पूज्य धर्मेंद्र मुनि जी*




*कर्म शरीर से कम और मन से अधिक बनते हैं तत्वज्ञ पूज्य धर्मेंद्र मुनि जी*

रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया
नगर के मांगलिक भवन में विराजित तत्वज्ञ पंडित रत्न पूज्य श्री धर्मेंद्र मुनि जी महाराज साहब ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीव के कर्म शरीर से कम और मन से अधिक बनते हैं। मन में इतनी शक्ति होती है कि वह सातवीं नरक के कर्मों का भी बंध कर सकता है और वही मन देवलोक व मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

पूज्य मुनि श्री ने बताया कि दर्शन से जीव को सही श्रद्धा प्राप्त होती है और चारित्र से वह आने वाले कर्मों को रोकता है। जब कर्मों की आवक कम और जावक अधिक होती है, तभी मोक्ष की ओर गति संभव है। हमें स्वयं आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि हमारी कषाय क्रोध, मान, माया और लोभ बढ़ रही हैं या घट रही हैं।

उन्होंने तंदुल मच्छ का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी काया छोटी थी, वह शरीर से अधिक पाप नहीं कर सकता था लेकिन मन से उसने नरक योग्य कर्मों का बंध कर लिया। मन की शुद्धि हेतु 12 भावनाओं का विधान बताया गया है। आचार्य परंपूज्य श्री उमेश जी महाराज साहब द्वारा बताई गई चार प्रमुख भावनाएँ
मैत्री, प्रमोद, करुणा और माध्यस्थ जीवन में सम्यकत्व को उत्पन्न और दृढ़ करती हैं।

पूज्य मुनि श्री ने कहा कि बिना चरित्र के मोक्ष संभव नहीं है। वैभव पुण्य के उदय से मिलता है, किंतु उस पर अभिमान पाप का कारण बनता है। अनित्य भावना के चिंतन से वैभव का नशा नहीं चढ़ता, अन्यथा भारी कर्मों का बंध होता है।

भगवान वह हैं जो राग-द्वेष के विजेता हों पूज्य प्रशस्त मुनि जी

धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य श्री प्रशस्त मुनि जी महाराज साहब ने कहा कि भगवान शब्द ‘भग’ और ‘वान’ से मिलकर बना है। ‘भग’ के अर्थ ईश्वर, रूप, यश श्री (आत्मिक लक्ष्मी) धर्म और प्रयत्न हैं। जो क्षमा को धारण करता है और राग-द्वेष का विजेता होता है, वही भगवान कहलाता है।

उन्होंने बताया कि भगवान के पास केवलज्ञान होता है, जिसमें तीन लोक और तीन कालों का संपूर्ण ज्ञान निहित होता है। दर्शन में क्षायिक सम्यकत्व और चरित्र में यथाख्यात चारित्र भगवान में उत्कृष्ट रूप से विद्यमान रहता है। आत्मबल अनंत होता है और समस्त साधना आत्मबल से ही संभव है।

धर्म आराधना निरंतर, तप-त्याग का क्रम गतिमान

आज पूज्य महाराज साहब के दर्शन हेतु खालवा से महिला मंडल की सदस्याएँ पधारीं। पूज्य सानिध्य में ज्ञान, ध्यान और तप निरंतर प्रवाहित है।
आज कर-तेले के प्रत्याख्यान संपन्न हुए। श्रीमती रतना समदड़िया, दीपा विनायक, आनंद श्रीश्रीमाल, रश्मि श्रीश्रीमाल सहित अनेक उपासकों के उपवास, आयंबिल एवं एकासन तप चल रहे हैं।
प्रभावना के लाभार्थी इंद्रचंद श्रीश्रीमाल परिवार रहे।






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