*खिरकिया मांगलिक भवन में विराजित अणुवत्स पूज्य श्री संयत मुनि जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित किया*







खिरकिया मांगलिक भवन में विराजित अणुवत्स पूज्य श्री संयत मुनि जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया भगवान की वाणी सुनकर यदि वैराग्य आ जाए तो दीक्षा की ओर अग्रसर होना यदि वैराग्य आने पर भी दीक्षा नहीं ले तो समझना कच्चा वैराग्य है सम्यक दृष्टि जीव को मोक्ष की रुचि होती है हमें संसार अच्छा नहीं लगता अर्थात हम सम्यक दृष्टि हैं। वैराग्य अपने को आए तो अच्छा या अपने रिश्तेदारों को आए तो अच्छा जीव की दशा वर्तमान में ऐसी है कि वैराग्य दूसरों को आए तो ही अच्छा लगता है अपना पुत्र या पुत्री यदि दीक्षा की ओर आगे बढ़े तो हम उनका हाथ पीछे खींचते हैं मोह कर्म ऐसा है जो जाने नहीं देता है यदि वैराग्य कच्चा हो तो रिश्तेदारों के आंसुओं से पिघल जाता है इधर मेघ कुमार का भी भगवान की वाणी सुनकर दीक्षा लेने का मन हुआ माता-पिता से आज्ञा लेने के लिए घर पहुंचे माता-पिता से कहा मैं भगवान के दर्शन किए उनकी वाणी सुनी और उनकी वाणी पर मैं श्रद्धा करता हूं यह सुनकर माता-पिता प्रसन्न हुए लेकिन अगले ही समय मेघ कुमार ने कहा मैं दीक्षा लेना चाहता हूं इतना सुनते ही उनकी माता मूर्छित हो गई माता-पिता का एकलौता पुत्र था यदि एकलौता पुत्र होता है तो दीक्षा देने के लिए माता-पिता पीछे हट जाते हैं क्योंकि अपने स्वार्थ के लिए हम उन्हें रोकते हैं लेकिन यदि पुण्यबाणी होगी तो ही कोई सेवा करेगा और यदि पुण्यबाणी नहीं है तो एक से अधिक पुत्र भी हो तो भी सेवा नहीं होगी
मधुर व्यानख्यानी पूज्य श्री आदित्य मुनि जी महाराज साहब ने बताया हमें अपनी आत्मा से राग द्वेष रूपी कर्म रूपी कचरे को साफ करना है हम यह संकल्प करें की आत्मा में नया कचरा नहीं भरना है और पुराने कचरे को साफ करना है जीव की दृष्टि सही कर ली समझ सही कर ली तो ही वह कचरे को साफ कर सकता है ज्ञान आत्मा को अनजाने के लिए है दूसरों को टाकने के लिए नहीं आचरण शुद्ध होगा तो मोक्ष की प्राप्ति होगी जिन शासन में प्रवेश कब मिलेगा जब हम त्याग करेंगे कर तीर्थ में प्रवेश करने के लिए व्रत प्रत्याख्यान लेना होता है त्याग करना होता है त्याग तीन प्रकार का है श्रद्धा वाला त्याग श्रावक धर्म वाला त्याग साधु धर्म वाले त्याग ।चारों गति के जिन शासनमें आते हैं लेकिन सिर्फ दो ही गति के जीव जिन शासन में प्रवेश करते हैं मनुष्य और तिर्यँच और सिर्फ मनुष्य गति के जीव है जन्म मरण को मिटाने वाले होते हैं भगवान ने हर पल को सार्थक करने का फरमाया है हमें आराधना से तीन दशा को मिटाना है पहले याचक दशा जब हमारी इच्छाएं खत्म होगी तो याचना भी खत्म हो जाएगी दूसरी दरिद्रता को मिटाने के लिए आराधना करना है और तीसरा रोगी दशा को मिटाने के लिए आराधना करना है तन को भले ही ना कोई रोग हो लेकिन मां का रोगी नंतो हर कोई होता है अतः इन सबको मिटाने के लिए हमें आराधना करनी है हमें सुखी बना है तो इस मनुष्य भाव रूपी मौके का लाभ उठाना होगा हमें अनंत पुनवानी से मनुष्य भाव मिला है निगोद के अंदर कितनी ही आत्माएं ऐसी है जो मनुष्य भाव मिलते ही आराधना कर मोक्ष प्राप्त कर ले पर उन्हें अवसर ही नहीं मिल रहा है समय अमोलक मिला है और उसकी पहचान कर हमें धर्म की ओर कदम बढ़ाना है तभी हमें शांति मिलेगी








