*भक्ति की स्वर लहरियों में डूबा खिरकिया, शत्रुंजय भावयात्रा में उमड़ा आस्था का सागर* ……. *(देखें वीडियो)* *‘सिद्धाचल दरबार’ के जयकारों से जीवंत हुआ खिरकिया, भावयात्रा में झूमे श्रद्धालु* …… *घर बैठे सिद्धगिरि की वंदना: शत्रुंजय भावयात्रा ने जगाई आस्था की ज्योति*…… *भक्ति-संगीत के संग खिरकिया में उतरा शत्रुंजय तीर्थ का दिव्य आभास* …… *(देखें वीडियो)* *स्वर और श्रद्धा का संगम: शत्रुंजय महातीर्थ भावयात्रा में भावविभोर हुआ नगर*….. *आदिनाथ प्रभु की स्तुति से गूंजा खिरकिया, भक्ति में लीन हुआ हर हृदय*





*भजनों की स्वर लहरियों से खिरकिया में जीवंत हुआ शत्रुंजय तीर्थ; भावयात्रा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब*

रिपोर्ट:यश पांडे
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खिरकिया। “सिद्धाचल दरबार झाझरमान लागे छे, राजा ऋषभ देव महरबान लागे छे।”….जैसे भक्तिपूर्ण भजनों और परमात्मा की स्तुति के बीच शनिवार की रात्रि खिरकिया का वातावरण मिनी पालिताणा में तब्दील हो गया। श्री जैन श्वेताम्बर श्री संघ द्वारा आयोजित ‘शत्रुंजय महातीर्थ भावयात्रा’ में श्रद्धालुओं ने घर बैठे ही सिद्धगिरि की पहाड़ियों की मानसिक वंदना की और पुण्य का अर्जन किया।
*भक्ति और संगीत का अनूठा संगम*
महोत्सव के शिखर दिन पर आयोजित इस भक्ति संध्या में उज्जैन के सुप्रसिद्ध भजन गायक श्री राज मोदी एवं टीम ने अपनी सुमधुर प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रभु आदिनाथ के चरणों में वंदना के साथ हुई। जब कलाकारों ने “आदिश्वर है प्यारो, मरूदेवानंद दुल्हारो” और “हे शंखेश्वर स्वामी, प्रभु जग अंतरयामि” जैसे स्तवन छेड़े, तो पूरा पांडाल प्रभु की भक्ति में झूम उठा।
*भावों की पावन गंगा: क्यों महत्वपूर्ण है भावयात्रा?*
जैन दर्शन में ‘भाव’ का अत्यधिक महत्व है। विद्वानों के अनुसार, जब भक्त शारीरिक रूप से तीर्थ तक नहीं पहुँच पाता, तब शुद्ध अंतःकरण से की गई ‘भावयात्रा’ साक्षात तीर्थ वंदना के समान फलदायी होती है।
•आत्मा से परमात्मा का मिलन: भजनों के माध्यम से जब भक्त “परमात्मा बनी जाशे मारो आत्मा” का संकल्प करता है, तो राग-द्वेष का शमन होता है।
• मानसिक शुद्धि: संगीत और मंत्रोच्चार के संगम से एकाग्रता बढ़ती है, जिससे आत्मा कर्मों के बंधन से मुक्त होकर सात्विकता की ओर अग्रसर होती है।
*आकर्षण का केंद्र रही ९९ यात्रा की महिमा*
कार्यक्रम के दौरान पालिताणा की पावन तलहटी और वहां की ९९ यात्राओं के महत्व को संगीत के माध्यम से जीवंत रूप में दर्शाया गया। श्रद्धालुओं ने आँखें मूंदकर मानसिक रूप से शत्रुंजय की पहाड़ियों का आरोहण किया और आदिनाथ प्रभु की साधना में लीन हुए। श्री संघ के सदस्यों ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य समाज के प्रत्येक आयु वर्ग को अपनी जड़ों और तीर्थों की महिमा से जोड़ना है।
“शत्रुंजय का कण-कण सिद्धों की साधना का साक्षी है। जब संगीत के सुर और भक्ति के भाव मिलते हैं, तो हृदय स्वयं एक मंदिर बन जाता है।”
> विजय कोचर सहसचिव सचिव श्री श्वेतांबर जैन श्री संघ खिरकिया










