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*वैभव में इंसान इतराता है, परन्तु यह है स्थाई नहीं है अपना इकट्ठा किया अपने काम नहीं आने वाला :- तत्वज्ञ पूज्य धर्मेंद्र मुनि जी*….. *पूज्य श्री का दीक्षा दिवस तप आराधना के साथ मनाया जाएगा*



वैभव में इंसान इतराता है, परन्तु यह है स्थाई नहीं है अपना इकट्ठा किया अपने काम नहीं आने वाला :- तत्वज्ञ पूज्य धर्मेंद्र मुनि जी

पूज्य श्री का दीक्षा दिवस तप आराधना के साथ मनाया जाएगा

रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया मांगलिक भवन में विराजित पूज्य श्री धर्मेंद्र मुनि जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि क्रोध न करें उन्हें क्षमा करें कषायो में ना रहे ताकि आपकी गति सुधरे इस प्रकार पति को समझाने पर उनकी गति सुधरी और वह देवलोक में गए क्षमा देना भी बहुत बड़ा धर्म है और क्षमा मांगना और क्षमता देना दोनों धर्म है और यह सिर्फ समकिती कर सकता है क्योंकि मिथ्या दृष्टि लोग तो ईट का जवाब पत्थर से देते हैं भगवान को ना मानने वाले अधिक थे और मानने वाले लोग कम थे क्योंकि समकिती लोग कम ही होते हैं जैसे चौथे आरे में केवल ज्ञान होना मुश्किल था वैसे ही पांचवें आरे में समकित मिलना दुर्लभ है क्योंकि कई लोग मार्ग मिल जाने पर भी भटक जाते हैं कषाय का क्षयोपक्षम कर क्रिया करना चारित्र है।वैभव कितना भी कमाओ बाद में दूसरों के ही काम आता है वैभव इकट्ठा करने में पाप, संभालने में पाप, छोड़ने में पाप, और जिन्होंने उसे भोगा भोगकर उदय उसमें भी पाप इस प्रकार वैभव की हर दशा में पाप का ही बंध होता है वैभव को देखकर जीव इतराते है लेकिन यह टिकने वाला नहीं यह अनित्य है वैसे ही शरीर भी अनित्य है यह वज्र जैसा शरीर कुशाग्र के अग्रभाग पर रखी पानी की बूंद के समान जो हवा आते ही नष्ट हो जाता हमें समझ में आया कि जीवन में कुछ भी नित्य नहीं है और मुझे पश्चाताप होने लगा चिकनगुनिया भी एक ऐसी बीमारी थी जिसे अच्छे-अच्छे पहलवानों को ढीला बना दिया । बुढ़ापे का स्वाद युवावस्था में लेना हो तो चिकनगुनिया वालों को देख लेवे
पूज्य श्री प्रशस्त मुनि जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि नमोत्थुणं सूत्र के द्वारा हम सिद्धों को भी नमस्कार करते हैं और अरिहंत को भी नमस्कार करते हैं प्रथम नमोत्थुणं से सिद्धू को नमस्कार करते हैं द्वितीय नमोत्थुणं में अरिहंतो को नमस्कार करते हैं मनुष्य में पांच ज्ञान होते हैं और तिर्यच में तीन ज्ञान होते हैं हमारे उपकारी तीर्थंकर भगवान ने सभी तीर्थंकर हमारे उपकारी हो ऐसा जरूरी नहीं नमस्कार दो तरह का होता है हम उन्हें भी नमस्कार करते हैं जो हमारे उपकारी है हम उन्हें भी नमस्कार करते हैं जो हमारे उपकारी नहीं हो क्योंकि हम तब उनके गुणो को उनके चरित्र को नमस्कार करते हैं तीर्थंकर स्वयं बुद्ध होते हैं जिन्हें खुद से ही समझ प्राप्त होती है ज्ञान और विद्वान दो अलग-अलग चीज हैं विद्वान वह है जिन्हें बहुत अधिक किसी चीज की जानकारी हो और ज्ञानी वह है जिन्हें सही श्रद्धा हो विद्वान तो कई बन जाते हैं लेकिन ज्ञानी वही होता है जो सही समझ की प्राप्ति करता है सही समझ दो प्रकार की हो सकती है एक तो प्रकृति से जो उनके स्वभाव में ही हो जैसे तीर्थंकर भगवान जन्म से ही तीन ज्ञान के धनी होते हैं और दूसरी सही समझ पढ़ कर सुनकर या किसी गुरु भगवंतो से जानकर मिलती है
तपस्या के क्रम में आनंद श्री श्रीमाल के आज पांच उपवास के प्रत्याख्यान हुए इसके साथ ही उपवास आयंबिल एकाशन के प्रत्याख्यान निरंतर गतिमान है

दीक्षा दिवस आज

तत्वज्ञ,संघहित चिंतक पूज्य श्रीधर्मेंद्रमुनि जी मा सा
का दीक्षा दिवस बसंत पंचमी 23 जनवरी को आ रहा है पूज्य श्री दीक्षा बसंत पंचमी1998 को हुईं थी पूज्य श्री की दीक्षा को 27 वर्ष पूर्ण हो चुके, अनंत पुण्यबानी से हमारे संघ को ऐसा दुर्लभ अवसर मिल रहा है इस अवसर को अधिक से अधिक त्याग, तपस्या एवं धर्म आराधना के साथ मनाया जाना है पूज्य श्री के दीक्षा दिवस को सामूहिक एकासन का आयोजन भी रखा गया है






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