*संसार अनित्य है इसकी किसी भी वस्तु या क्रिया पर गुमान मत कीजिए*


संसार अनित्य है इसकी किसी भी वस्तु या क्रिया पर गुमान मत कीजिए
रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया मांगलिक भवन में विराजित पूज्य श्री धर्मेंद्र मुनि जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि साधु तटस्थ भाव से किसी को सुनाएं तो साधु को लाभ है कपिल मुनि विहार कर कर जा रहे थे बीच में बलभद्र आदि चोर मिले चोरों ने कहा कि आप कुछ सुनाओ तो साधु ने देखा कि हलु कर्मी जीव है तो उन्हें उपदेश दिया अतः उपदेश देने में लाभ साधु को है और सुनने वाला धैर्य पूर्वक सुने तो उसे भी लाभ है साधु साध्वी राग द्वेष छोड़ने के उपदेश देते हैं और बात भी सही है पर जिनका मोह कर्म की
तीव्रता होती है उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती है, संसार अनित्य और अशाश्वत है अनंत जीव अनित्य भावनाओं को भातें मोक्ष पधारे हैं इस भावना से राग द्वेष कम होता हैं यह शरीर रोगों का घर है यह शरीर रोगों का मंदिर है सही दृष्टि से देखा तो राग द्वेष कम होता है तभी हमारी आसक्ति कम होती है परिग्रह की मर्यादा करी तभी राग द्वेष की प्रवृत्ति कम होती है जितनी भी आराधना है उसका उद्देश्य यही है कि हमें राग और द्वेष काम करना है यदि जीवन में दुख आए तो यह विचार करना है कि दुख सुख नहीं रहा तो दुख भी नहीं रहेगा। दुख को नष्ट करने के उपाय स्वयं के अंदर है एक व्यक्ति भगवान के पास गया और शिकायत की की मेरे पास पहनने के लिए जूते नहीं है शिकायत कर के जब वह बाहर आया तो उसने देखा कि एक व्यक्ति जिसके दोनों पैर नहीं थे यह देख उसके मन में विचार आया कि भगवान ने मुझे कम से कम पैर तो दिए हैं फिर जाकर पुनः भगवान से कहा कि भगवान आपका शुक्रिया कम से कम आपने मुझे पैर तो दिए इस प्रकार जब हम दुखी हो तो अपने से अधिक दुखी व्यक्ति को देखते हैं तो हमें अपना दुख कम लगता है
पूज्य प्रशस्त मुनि जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि शकेंन्द्र जो देवों के स्वामी है विशिष्ट रिद्धि के धारक है वह भी अपनी रिद्धि का मान छोड़कर भगवान को नमस्कार करता है पुरुषों में उत्तम अर्थात पुरुषों में श्रेष्ठ सिंह के समान भगवान है पुरुषों में पुंडरीक कमल के समान है और भगवान गंध हस्ती के समान है यह उपमा भगवान को अपेक्षा से दी गई है जिस प्रकार शेर शूरवीर विशिष्ट पराक्रमी होते हैं वैसे ही भगवान भी कर्म शत्रुओं से, उपसर्ग परिषहो से डरने वाले नहीं होते हैं ।शेर क्रूर होता है उसी प्रकार भगवान भी अपने कर्म रूपी शत्रुओं के लिए क्रूर होते हैं भगवान को पुंडरीक कमल के समान बताया है जिस प्रकार कमल कीचड़ में रहते हुए भी निर्मित होता है उसी प्रकार भगवान भी कर्मों के उदय से जन्म लेते हैं भोगों के बीच बड़े होते हैं लेकिन मोह कर्म के मोह जाल से वह निर्लिप्त होते हैं जिस प्रकार कमल स्वभाव से सुंदर होता है उसी प्रकार भगवान भी कमल के समान विशिष्ट सुंदर होते हैं कमाल के फूल पर लक्ष्मी का निवास होता है उसी प्रकार भगवान के ऊपर गुण रूपी लक्ष्मी निवास करती है भगवान गंध हस्ती के समान होते हैं जिस प्रकार गंध हस्ती के शरीर से विशिष्ट गंध आती है और जहां-जहां वह हाथी जाता है दूसरे हाथी उसकी गंध से भाग जाते हैं उसी प्रकार भगवान जहां-जहां विहार करते हैं वहां महामारी रोग आदि नहीं आते हैं भगवान लोक में उत्तम होते हैं अर्थात भगवान तीन लोक के नाथ होते हैं यह लोक छे द्रव्य से मिलकर बना है धर्मस्तिकाय और अधर्मस्तिकाय का आकाशास्तिकाय , काल द्रव्य जीवास्तिकाय और पुद्गलास्तिकाय धर्मस्तिकाय का कार्य है व्यक्ति को चलने में सहायक बनना जिस प्रकार पथरीले रास्ते पर चप्पल चलने में सहायता से चलते हैं उसी प्रकार धर्मस्तिकाय हमें चलने में सहायता देता है और अधर्मस्तिकाय हमें रुकने में सहायक होता है आकाशास्थिकाय के हमें स्थान देता है काल द्रव्य नए को पूराना और पुराने को नष्ट करता है की जीवास्तिकाय जिनमें ज्ञान दर्शन सहित आदि उपयोग गुण होते हैं । और पुद्गलास्तिकाय संसार में जितना भी हमें आंखों से दिखाई दे रहा है वह सब पुद्गलास्तिकाय है
तपस्या की लड़ी में श्रीमती विजेता मेहता के आज तेले की तपस्या है




