*राजपूत समाज का ऐतिहासिक संकल्प*… *अब मृत्यु भोज नहीं, गौशाला में होंगे शोक कार्यक्रम*…. *(देखे वीडियो)* *शोक में भी सेवा का संदेश स्वर्गीय सीताबाई पटेल की शोक सभा में राजपूत परिषद का बड़ा निर्णय*….. *राजपूत समाज गौशाला स्थापित करेगा* *गौसेवा करना हम सभी का परम धर्म:बद्री पटेल सांगवा (संभाग अध्यक्ष राजपूत परिषद)* ….*(देखे वीडियो)* *


राजपूत समाज का ऐतिहासिक संकल्प
मृत्यु भोज का त्याग, सेवा और गौसंरक्षण का मार्ग अपनाया
रिपोर्ट:,यश पांडे
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राजपूत समाज की प्रगति ओर अपनी आध्यात्मिक जीवन यात्रा का संभाग राजपूत परिषद अध्यक्ष बद्री पटेल ने बताया
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खिरकिया सांगवा।
राजपूत समाज ने सामाजिक सुधार और धार्मिक चेतना की दिशा में एक ऐतिहासिक व प्रेरणादायी निर्णय लेते हुए मृत्यु भोज की परंपरा को पूर्णतः समाप्त करने और उसे ‘गौ-भोज’ व गौसेवा में परिवर्तित करने का संकल्प लिया है। यह निर्णय पूज्य माताजी स्वर्गीय सीताबाई पटेल की शोक श्रद्धांजलि सभा के अवसर पर सर्वसम्मति से लिया गया।
राजपूत परिषद के संभाग अध्यक्ष श्री बद्री पटेल सांगवा ने इस निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि अब समाज के सभी शोक एवं श्रद्धांजलि कार्यक्रम गौशाला में संपन्न होंगे, जिससे आडंबर के स्थान पर सेवा, करुणा और धर्म का भाव प्रकट हो सके। उन्होंने यह भी घोषणा की कि राजपूत समाज स्वयं की गौशाला की स्थापना करेगा, जो गौसंरक्षण और समाज सेवा का स्थायी केंद्र बनेगी।
गौसेवा ही हमारा धर्म है बद्री पटेल
इस अवसर पर श्री बद्री पटेल ने कहा
गौसेवा हमारे लिए परम धर्म है। ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय हैं। समाज को सेवा, संस्कार और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ाना ही हमारा उद्देश्य है।
उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्हें माता-पिता से धार्मिक संस्कार विरासत में मिले हैं, जिन्हें वे अपने आचरण और सेवा कार्यों में उतार रहे हैं।
आस्था, साधना और सेवा का समन्वय
श्री बद्री पटेल ग्राम सांगवा स्थित प्राचीन जागेश्वर महादेव तथा चारूवा स्थित प्राचीन गुप्तेश्वर महादेव के नियमित साधक हैं। वे नर्मदा परिक्रमा भी पूर्ण कर चुके हैं तथा साधुमार्गी जैन समाज के समता भवन के नियमित उपासक हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि वे अपनी पूज्य माताजी स्वर्गीय सीताबाई पटेल के साथ पूर्व में चारधाम यात्रा कर चुके हैं, जो उनके धार्मिक जीवन की एक महत्वपूर्ण स्मृति है।
समाज सुधार की अनुकरणीय पहल
राजपूत समाज का यह निर्णय समाज में फिजूलखर्ची और दिखावे के स्थान पर सेवा, संवेदना और गौसंरक्षण को प्राथमिकता देने वाला माना जा रहा है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को धार्मिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और करुणा का संदेश देती है।
यह निर्णय न केवल राजपूत समाज के लिए, बल्कि समूचे समाज के लिए एक प्रेरक उदाहरण बनकर उभरा है।





