*आत्म हित का बोध वही दे सकते हैं जो स्वयं का हित कर चुके हैं :- पूज्य सारिका जी मसा*





आत्म हित का बोध वही दे सकते हैं जो स्वयं का हित कर चुके हैं :- पूज्य सारिका जी मसा
रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया आचार्य उमेश मुनि जी महाराज साहब की आज्ञानुवर्ती पूज्य श्री किरण बालाजी महाराज साहब ठाणा चार सुख सतापूर्वक समता भवन में विराजित है पूज्य श्री सारिका जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि आत्महित का बोध वही देते हैं जो स्वयं का हित कर चुके होते हैं जीवन में एकमात्र सीखने जैसा कुछ है तो वह आत्महित करो बस कोई भी अनुष्ठान करो उसमें सिर्फ आत्म हित धोना चाहिए भगवती सूत्र में आता है कि भगवान महावीर के समीप दो देव आए भगवान से पृच्छा की और वापस चले गए गौतम स्वामी ने देखा की देव पृच्छा कर वापस चले गए वह स्वयं चार ज्ञान के धनी थे लेकिन उन्होंने उपयोग नहीं लगाया अपने ज्ञान का और भगवान से पूछा की भगवान देवों ने आपसे क्या पूछा भगवान ने समाधान दिया कि वह देवों से जाकर पूछो गौतम स्वामी ने देवों के पास जाकर पूछा तब देवों ने बताया कि हमने भगवान से पूछा था कि आपके शिष्यों में से कितने शिष्य मोक्ष पधारेंगे तब भगवान ने बताया कि 700 शिष्य मोक्ष पधारेंगे यह सुनकर गौतम स्वामी पुनः भगवान के पास आए और पूछा कि भगवान उन 700 शिष्यों में क्या मेरा भी नंबर है भगवान ने कहा हां तात्पर्य यह है कि उन्होंने सिर्फ अपने बारे में पूछा यह नहीं पूछा कि दूसरा कौन जाएगा कौन नहीं जाएगा हम होते तो पहले दूसरों के बारे में पूछते दूसरों की पंचायती करते हैं हमारे जीवन में 24 घंटे में कर्मबंध का समय अधिक है और निर्जरा का समय कम है क्योंकि हमारी सुखशीलता पर कड़क नजर नहीं है हम सुख पाना चाहते हैं जहां थोड़ी सी गर्मी लगी तो ऐसी चालू कर लेते हैं थोड़ी सी ठंड लगी तो हीटर चालू कर लेते हैं काया का मुंह हमें बहुत अधिक है तभी हम आराधना से जुड़ नहीं पाते हैं हमें जिन वचनों पर सद्भावना भरी नजर रखनी चाहिए भगवान ने जो भी कहा वह सत्य है सत्य है और शंका से रहित है
पूज्य शिल्पा जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि एक अस्थिर मन वाला व्यक्ति महात्मा के पास गया और बोला मुझे ऐसा मंत्र दो कि मैं देवों को वश में कर लूं देव जो इतने शक्तिशाली होते हैं एक चुटकी बजाते ही जम्बुदीप के २१ चक्कर लगा लेते हैं ऐसे शक्तिशाली देवों को वह वश में करना चाहता था महात्मा ने पूछा कि क्या तुम्हारे घर में काम करने वाले नौकर तुम्हारे वश में है तब उस व्यक्ति ने कहा नहीं वह तो अपनी मर्जी से आता है जिस दिन उसे छुट्टी माननी है छुट्टी मना लेता है और काम करने के लिए भी बोलते हैं तो पूरी तरह से नहीं सुनता है फिर महात्मा ने पूछा कि तुम्हारी शादी हो गई है तो व्यक्ति ने कहा तो फिर क्या तुम्हारी पत्नी तुम्हारे वश में है नहीं मेरी पत्नी तो जो चाहती है मन का वही करती है मेरा कहां सुनती है उसने जो कह दिया वह तो पत्थर की लकीर फिर महात्मा ने पूछा कि क्या बेटा तुम्हारे वश में है नहीं महात्मा जी आजकल के बेटे कहां मां-बाप की सुनते हैं मैं तो अपनी मनमानी करते हैं तब महात्मा ने कहा तुम्हारा नौकर तुम्हारी पत्नी तुम्हारा परिवार कोई तुम्हारे वश में नहीं है तो बताओ क्या तुम्हारा शरीर तुम्हारा वश में है हमारा शरीर भी हमारे वश में कहां हैसफेद बाल बिना इजाजत आ जाते हम नहीं चाहते कि सफेद बाल आए हम नहीं चाहते कि बुढ़ापा है लेकिन फिर भी हमारी मर्जी कहां चलती है दशरथ जी ने अपना जब एक सफेद बाल देखा तो उन्होंने सोचा कि अब निवृत्ति का समय आ गया और उन्होंने संसार से निवृत्ति ले ली अर्थात शरीर भी हमारी नहीं मानता है फिर महात्मा जी ने उसे भाई को समझाते हुए बताया कि की शरीर भी तुम्हारे वस में नहीं यहां तक कि हमारा मन भी हमारे वश में नहीं है जिस दिन हमने मन को भी वश में कर लिया उस दिन देव तो क्या पूरी दुनिया हमारे वश में हो जाएगी क्योंकि हमारा यह मन भी बहुत चंचल है पांच इंद्रियों जितनी खतरनाक नहीं उतना खतरनाक मन है पांच इंद्रियों को दौड़ने वाला यह हमारा एकमात्र मन है मन हमारा लोटा है दूध में डुबोगे तो दूध से भर के आ जाएगा पानी में डुबोगे तो पानी से भर कर आ जाएगा नाली में डुबोगे तो गंदगी से भर कर आ जाएगा मन हमेशा हमें भटकता है इसे शास्त्रों में घोड़े की और बंदर की उपमा दी हुई है साधक आत्मा मन का मलिक होता है










