*जिनवाणी को सुनने मात्र से कुछ नहीं होने वाला उसे अंदर उतारने से ही कल्याण होगा*





जिनवाणी को सुनने मात्र से कुछ नहीं होने वाला उसे अंदर उतारने से ही कल्याण होगा
रिपोर्ट:यश पांडे

खिरकिया धर्म सभा को संबोधित करते हुए पूज्य श्री सारिका जी महाराज साहब ने बताया दो प्रकार के बंध है राग बंध
और द्वेष बंध राग जीव को भव में बांधता है सबसे ज्यादा राग जीव को शरीर पर होता है जहां सिद्ध है वहां शरीर नहीं है हम दिन भर शरीर की सेवा करते हैं शरीर जीव को ठगने वाला है सबसे बुद्धिमान इस धरती पर मानव कहलाता है लेकिन वह मानव भी शरीर के कारण ठगा रहा है शरीर की साल संभाल में घंटो लगाते है शरीर रहने वाला नहीं है उसके लिए वह बहुत समय व्यर्थ गवाते हैं भगवान ने कहा पानी की एक बूंद में और असंख्या जीव है पर हम रोज फिर भी असंख्यात जीव की हिंसा करके नहाने से नहीं चूकते हैं हमारा यह शरीर दुर्गंध और असुचि पदार्थ से भरा हुआ है प्रतिदिन नहाने से भी यह शुद्ध नहीं होने वाला कोई भी नया कपड़ा या नया गहना शरीर पर लगते ही पुराना व गंदा हो जाता है शरीर से मोह रहेगा तो हम अपना तीसरा मनोरथ कभी भी पूर्ण नहीं कर पाएंगे
पूज्य श्री शिल्पा जी महाराज साहब ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सभी जीवो को अव्याबाध सुख चाहिए पर यह सुख किसी को नहीं मिल रहा है क्योंकि दीवाल पर रसगुल्ला का चित्र बनाएं और लोगों को कहे कि इसका स्वाद मीठा है यह सफेद कलर का है सभी बता दिया पर खाए बिना उसका आनंद नहीं आएगा ठीक उसी तरह जिनवाणी को मात्र कान में डालने से कुछ नहीं होगा जब तक की जिनवाणी को हम हृदय में नहीं डालेंगे पांचवें आरे में कुंडे में रतन बताया गया है जो चीज व्यक्ति को फ्री में मिलती है वह उसकी कदर नहीं करता है हमें यह धर्म विरासत में मिला है और यह विरासत हमें बहुत-बहुत पुण्यवाणी के कारण मिली पर हमें इसकी कद्र करनी चाहिए जब व्यक्ति के सिर पर बाल नहीं होते हैं तो वह बाल उगाने के लिए दवाई ढूंढता है फिर जब बाल बढ़ने लगते हैं तो बाल कटवाने के लिए नाई को ढूंढता है फिर जब बाल काले हो जाए तब वह अपने लिए लुगाई को ढूंढता है और जब बाल सफेद होने लगे तो फिर डाई को ढूंढता है संसार में सुख ढूंढना इस प्रकार जिस प्रकार बालू रेत से तेल निकालना या पानी में से मक्खन निकालना है । समझाना आसान है पर समझना कठिन है संसार का सुख नकली सुख है अभी तक हम सभी बने प्रसिद्ध नहीं बने अब सिद्ध बनने की सीढ़ी का टिकट हमें हाथ में आया है यह मनुष्य भव और आयुष्य क्षण क्षण जा रहा है अतः हम प्रमाद न करें और धर्म के द्वारा में प्रवेश करें









