*स्वाध्याय से कर्मों की विपुल निर्जरा होती है – साध्वी प्रज्ञा श्री जी* *सम्यक ज्ञान, दर्शन ,चारित्र, तप मोक्ष के मार्ग हैं -साध्वी प्रणति श्री जी*

स्वाध्याय से कर्मों की विपुल निर्जरा होती है – साध्वी प्रज्ञा श्री जी
सम्यक ज्ञान, दर्शन ,चारित्र, तप मोक्ष के मार्ग हैं -साध्वी प्रणति श्री जी
रिपोर्ट,:यश पांडे

खिरकिया:-दिनांक 23.07.2025 दिन बुधवार को समता भवन में विराजित आचार्य श्री रामलाल जी महाराज साहब की आज्ञानुवर्ती शासन दीपिका श्री प्रज्ञा श्री जी महाराज साहब ने फरमाया कि – सूर्य के उदित होने पर अंधकार का नाश हो जाता है । अमावस की घोर काली रात में चंद्रमा की एक किरण भी हमें सुख की अनुभूति कराती है ।व्यक्ति यदि निरंतर ज्ञानार्जन में रत रहता है तो उसके भीतर से प्रमाद और कषाय घटता जाता है ।निरंतर ज्ञान ध्यान फेरने से हमारी कषाय हल्की बनेगी । स्वाध्याय में रमण करने से व्यक्ति की सोच निर्मल बनती है। विषय विकार की भावना कम होती है और दुर्गुण घटते हैं। अधिक से अधिक स्वाध्याय विपुल कर्म निर्जरा का साधन है। संगठन में बहुत शक्ति होती है। यदि संघ व समाज को सफल बनाना है तो वहां एकता का होना बहुत आवश्यक है। तुच्छ बातों के पीछे विवाद नहीं करना चाहिए। सार को ग्रहण कर लो, असार को छोड़ दो।
पूज्य श्री प्रणति श्री जी महाराज साहब ने फरमाया कि- जब हमारी आत्मा सम्यक ज्ञान, दर्शन, चारित्र में रमण करती है तो वह अपने सिद्ध स्वरूप में की ओर कदम बढ़ाती है। यदि आपको कम से कम समय में अपनी आत्मा को सिद्धत्व की ओर ले जाना है तो आपको सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन ,सम्यक चारित्र और सम्यक तप में पुरुषार्थ करना होगा। इस अवसर पर श्रावक -श्राविकाएं और श्रद्धाशील गुरु भक्त उपस्थित थे।
धर्मसभा में संचालन राजकुमार रांका ने किया। म सा की प्रेरणा से कई श्रावक श्राविकाओं ने त्याग पचखान ग्रहण किए एवं दिनांक 24/08/25 को पक्खी पर्व पर अधिक से अधिक धर्म आराधना साधना तप त्याग कर पर्व को मनाने का लक्ष्य रखे




