धर्म

*खिरकिया समता भवन में फाल्गुनी चातुर्मासिक पर्व पर हुई आराधना।*…. *मोक्ष का द्वार मनुष्य गति से ही खुलता है….तेजकुमार तांतेड़*…. *मनुष्य भव देवो से भी दुर्लभ….किरण चंडालिया*….. *स्वाध्याय से जीवन संस्कारित बनता है….रूपेश भंडारी*

 

 

 

खिरकिया समता भवन में फाल्गुनी चातुर्मासिक पर्व पर हुई आराधना।

मोक्ष का द्वार मनुष्य गति से ही खुलता है….तेजकुमार तांतेड़

मनुष्य भव देवो से भी दुर्लभ….किरण चंडालिया

स्वाध्याय से जीवन संस्कारित बनता है….रूपेश भंडारी

 

रिपोर्टर:,यश पांडे

 

खिरकिया:- फाल्गुनी चातुर्मासिक पर्वाराधना १३ मार्च गुरुवार को श्री श्वेतांबर जैन श्री संघ खिरकिया के तत्वाधान में समता भवन में पधारे स्वाध्यायियो के सानिध्य में १३ तारीख को सुबह 5:40 बजे से राई प्रतिक्रमण,7:00 बजे से प्रार्थना, 9:00 बजे से 10:20 तक प्रवचन के दौरान इंदौर से पधारे वरिष्ठ स्वाध्यायी तेजकुमार तातेड ने जिनवाणी का अमृत रसपान कराते हुए कहा कि जीव मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं पहले संसारी दूसरा सिद्ध। सांसारिक जीव भी दो प्रकार के होते हैं अभवी जीव दूसरा भवी जीव । अभवी जीव कभी भी मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता। भले ही वो साधु के समान क्रिया करके 9 ग्रेवियक देव तक चल जाए फिर भी उसे सिद्ध गति प्राप्त नहीं होती। सिद्ध गति या मोक्ष उसे भवी जीव को प्राप्त होता है जिसने अपने आठों कर्मों को क्षय कर दिया हो। मोक्ष का द्वार मनुष्य गति से ही खुलता है उन्होंने आगे कहा कि जिनवाणी को आत्मसात कर जीवन को मर्यादित कर समुद्र के समान गंभीर व धैर्यवान बनना है।
इसके पूर्व वरिष्ठ स्वाध्यायी किरण चंडालिया ने मानव जीवन की दुर्लभता को उदाहरण देकर समझाया और कहा कि हमें यह जीवन जो मिला है वह दुर्लभ है! सुलभ नहीं है! दुर्लभ यानी जिसे कठिनता से प्राप्त किया जाए। सुलभ याने जिसे सरलता से प्राप्त किया जाए हमें अनंता – अनंत पुण्यवाणी से यह मनुष्य भव मिला है जो देवों को भी दुर्लभ है इसे यूं ही व्यर्थ ना गवाएं। धर्म आराधना साधना करके इस भाव को सार्थक करें। इनके बाद खिरकिया नगर के गौरव स्वाध्यायि रूपेश भंडारी ने स्वाध्याय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पूर्व भाव के संचित कर्मों को क्षय करने का सर्वोत्तम साधन स्वाध्याय है। स्वाध्याय भी एक प्रकार का तप है, स्वाध्याय करने से कर्मों की महान निर्जरा होती है। स्वाध्याय का मतलब स्वयं का अध्ययन करना है स्वाध्याय से जीवन संस्कारित बनता है। इस अवसर पर श्रद्धानिष्ठ लगभग ११९ श्रावक-श्राविकाओं एवं गुरु भक्तों ने जिनवाणी का अमृत रसपान किया।साथ ही लगभग 20 से भी अधिक ने उपवास,तथा 15 ने पौषध,रात्रि संवर 20 ने कर दिवस की सार्थकता को सिद्ध किया। दोपहर 1:50 बजे से धार्मिक प्रतियोगिता,ज्ञान चर्चा,आलोयणा, शाम 6:30 सूर्यास्त के साथ देवसी प्रतिक्रमण,रात्रि 7:30 बजे से पूर्णिमा की बड़ी साधना -गुरुभक्ति तत पश्चात रात्रि संवर। दिवस को श्रद्धाशील उपासकों ने मनाया।
यह जानकारी अखिल भारत वर्षीय साधुमार्गी जैन संघ के पूर्व राष्ट्रीय कार्यालय मंत्री ने दी।

 

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